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“विश्वास कुमार शर्मा कैसे बने डॉ.कुमार विश्वास”

अगर आप सोचते हैं कि आज के रॉक स्टार कवी कुमार विश्वास का नाम उनके पिताजी जी ने ही “कुमार विश्वास” रखा तो आप हिंदी फिल्में बहुत सारी देखते हैं। असल में ऐसा कुछ नही हुआ हम आपको बताते हैं की “कुमार विश्वास” कैसे बना।

कहानी शुरू होती है वोही हिंदी फिल्मों की तरह एक मध्यम वर्गीय परिवार से।प्रोफेसर पिता के सबसे छोटे बेटे थे विश्वास कुमार शर्मा। पढ़ने लिखने में बचपन से मेधावी थे अब ये शोध का विषय है कि ये उनकी स्वयं की बुद्धि थी या अध्यापक पिता की कुटाई का असर।

पिता बनाना चाहते विश्वास कुमार शर्मा को Er. विश्वास कुमार शर्मा पर जनाब को तो शौक लग गया कविताएं लिखने का। घर वालों से छुपते छिपाते लिखते रहते थे कविता विश्वास कुमार। कोई नही चाहता था कि विश्वास कविता लिखे सिर्फ बड़ी बहन को छोड़कर।

अब धीरे धीरे विश्वास कुमार कविताएं लिखते जा रहे थे और फिर उन्होंने एक दिन देखा की अखबार वालों ने कविता प्रकाशन का मौका दिया है तो बन्दे के दिमाग की घण्टी बज गयी और लिख डाली एक कविता और नीचे नाम लिख दिया “विश्वास कुमार शर्मा” और अपनी बहन को दिखा दिया।

बहन ने पढ़कर कहा कविता अच्छी है पर नाम नही जच रहा तो विश्वास कुमार सोचने लगे की इसमें तो बाबूजी की गलती है दीदी हमको काहे डाँट रही है। तब नाशा के वैज्ञानिकों की तरह अपार शोध करके दीदी ने विश्वास कुमार शर्मा को नाम दिया “कुमार विश्वास” ! अब ये नाम सुनते ही बन्दे को आयी हीरो वाली फीलिंग और अपना नाम ही रख लिया “कुमार विश्वास” !

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बंदे को नाम “कुमार विश्वास” रखते ही आने लगी बड़े वाली फीलिंग पर हमने बताया तो था कि पिता जी को तो Er.विश्वास कुमार शर्मा बनाना था तो भेज दिए इंजीनियरिंग कॉलेज में Er बनाने के लिए।पर बंदा था पक्का बोकाली वही लिखने लग गया कविताएं। अरे जो “पगली लड़की” तुम सब गाते फिरते हो उन्ही इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में तो लिखी गयी थी। बंदे ने कुछ दिन तो गुज़ारे कॉलेज में लेकिन फिर एक दिन भाग आए कॉलेज छोड़कर और पिताजी को बोल दिया की हम ना बन रहे Er, हम तो बनेंगे कवी और वो भी कुमार विश्वास। अब अध्यापक पिता के सामने इतना बोला तो कुटाई तो अच्छे वाली हुई ही होगी पर बंदा टस से मस ना हुआ।

पिता जी ने भी कह दिया बेटा साहित्य पढ़ना है तो अपने पैसे से पढ़ो।अब बन्दे का नाम भी अब कुमार विश्वास था तो कर लिया पिताजी का चैलेंज स्वीकार और BA में दाखिला लेकर पढ़ना शुरू कर दिया साहित्य।

तो हुआ एक बार यूँ की एक कवी सम्मेलन में कुमार विश्वास(अब ये नाम फाइनल हो ही चूका था) के दोस्त के पिताजी ने मौका दे दिया कविता पढ़ने का तो फिर क्या बंदे ने आग लगा डाली कविताओं से।कुछ रूपए भी मिले तो होंसला और बढ़ गया । बस फिर क्या मंचों पर जाने लगे कुमार विश्वास और BA की और फिर MA में टॉप किया तो पिताजी को पता चल गया की लड़का दूर तक जाएगा। फिर कर ली PHD तो हो गए “डॉ.कुमार विश्वास” !

अब उसके बाद 2005 में एक कॉलेज में “कोई दीवाना कहता है” गायी तो पूरे जमाने में कुमार विश्वास, कुमार विश्वास होने ही लगा। फिर आगे की कहानी आप सब जानते ही हो लेकिन फिर भी अगर पढ़ने में मजा आया हो और जिद हो गयी हो कि मुझसे ही बाकी कहानी सुननी है अभी इसको अच्छे से पढ़ो और शेयर करो और कविराज से वेरीफाई भी कर लो और हमको भी बता दो तो जल्द ही आगे का किस्सा लेकर आपके बीच लेकर आएंगे !

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4 comments

  1. kumar shab aisa keya hai ke aap ke kavita or mere engineering college mai suru hue per aap aap ke kavita puri ho gaen or mere engineering. per aaj aap ke chhap gaen or hamari patni ke haat jal gaen (shadi engineering ke baad hue) tamnna ab .bhi machalti hai kuchh khwab ab bhe sulagte hai. wo milte nahen kaen saal gujren hai.mager chehra koen dekhu toan her naksh milta hai

  2. Mahendra Singh Thakur

    बहुत खूब इसी का नाम हैं कुमार विश्वास …

  3. sir aap kuchh bhi bta de.n bt ye nahin bta paoge wo pilkhuwe wali kaun thi jiske papa inke mandir m pujaari the. . .try kro

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