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सम्मान को तरसती दलित शहीद की अस्थियां !!

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शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।”

जगदम्बा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ जी का यह शेर तो आपने हमारे प्यारे नेताओं के सुरभित मुखारविंद से झड़ते हुए प्रायः सुना ही होगा। नेता जी शेर पढ़ते हैं तो लगता है उनसे बड़ा शहीदों का कोई हितैषी ही नहीं है। शहीद की लाश जब घर आती है, तो नेता जी घर पर आते हैं, मेला लगाते हैं और चले जाते हैं। मेला उजड़ जाता है, फिर कोई सुध नहीं लेता। सबकी देशभक्ति किसी और ठौर-ठिकाने की ओर चल देती है।

फ़िरोज़ाबाद, वैसे तो अपनी चूड़ियों के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, पर इसी फ़िरोज़ाबाद ने चार महीने पहले एक शहीद की विधवा के हाथों की चूड़ियाँ टूटते देखीं। दूर-दूर से बहुत सारे लोग आये थे। भीड़ के आकर्षण में कुछ नेतागण भी आये थे। प्रदेश सरकार ने भी अपनी नीति के अनुसार शहीद परिवार को 20 लाख रुपये देने तथा परिवार के एक सदस्य को नौकरी का ऐलान किया। चार महीने हो गए हैं, न तो रुपये मिले और न ही नौकरी मिली है। अब न तो कोई राजनेता आते हैं, न ही कोई अफसर, जिससे अपनी बात कही जा सके।

उत्तर प्रदेश के फ़िरोज़ाबाद स्थित नगला केवल निवासी वीर सिंह जी कश्मीर के पम्पोर में सीआरपीएफ की बस पर 22 जून को हुए आतंकी हमले में शहीद हो गए थे। वीर सिंह जी को गोलीबारी के दौरान 7 गोलियां लगीं थीं, इसके बावजूद उन्होंने अपनी एके-47 राइफल से 39 राउंड फायरिंग की थी। 25 जून को उनका पार्थिव शरीर उनके घर पहुंचा, तो हज़ारों लोग उसमें शामिल हुए थे। अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने भविष्य में हर सम्भव सहायता करने का वायदा भी किया था। जनप्रतिनिधियों ने तो शहीद के नाम से स्मारक और गाँव में प्रवेश द्वार बनवाने का ऐलान भी किया था। शहीद की चिता की राख स्मारक को तरसती ही रह गई और नेताओं ने इसे भी चुनावी वायदा ही बना दिया।

शहीद की पत्नी रुंधे हुए गले से कहती हैं कि ,”पिछले महीने आतंकी हमले में इटावा के शहीद परिवार से खुद मुख्यमंत्री ने मिलकर 20 लाख रुपये दिए थे, पर हमारे यहाँ शायद जाति देखकर नहीं आये। क्या हमारे दलित होने के कारण मुख्यमंत्री यहां नहीं आएं? क्या अब शहादत को भी जाति से जोड़कर देखा जायेगा?” यहाँ यह भी बताते चलें कि जब शहीद वीर सिंह जी का पार्थिव शरीर गाँव आया तो उनके अंतिम संस्कार को लेकर भी तथाकथित ऊँची जाति के कुछ दबंगों ने उनके दलित होने के कारण अंतिम संस्कार के लिए ज़मीन देने से भी मना कर दिया था। अधिकारियों के हस्तक्षेप से मामला सुलझाया गया था।

ऐसे न जाने कितने ही शहीद आज भी अपने ही देश में सम्मान को तरस रहे हैं और हम सोशल मीडिया श्रद्धांजलि देकर देशभक्त हो रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो “वतन पर मिटने वालों का क्या कोई निशान भी बाकी रहेगा?”

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