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NDTV बैन : लोकतंत्र में मीडिया पर लगाम कहाँ तक सही ?

इमरजेंसी के बाद मीडिया पर किसी भी तरह के बैन की यह पहली घटना होगी, जब NDTV जैसे पुराने न्यूज़ चैनल पर बैन लगा है। आज जब मीडिया चैनलों की महत्ता एवं राजनीति पर उसका प्रभाव इतना बढ़ गया है तब ऐसी घटनाओं का होना भी एक प्रकार की आतंरिक राजनीति का भी द्योतक है।

आजकल जहां ज्यादातर चैनल किसी ना किसी राजनीतिक विचारधारा से जुड़े होने के कारण कई ख़बरों को दबा देते हैं, उस दशा में उन दबी हुई ख़बरों को भी स्थान देने की अपनी परंपरा के लिए NDTV जाना जाता रहा है। केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद से ही उनके बड़बोले नेताओं द्वारा तो अब तक देश के लिए ये सुनिश्चित कर ही दिया गया था कि क्या खाना चाहिए, क्या पहनना चाहिए, किसकी पूजा करनी चाहिए, किस धर्म के लोगों को कितने बच्चे पैदा करने चाहिए, लड़कियों को कितने समय तक घर के बाहर रहना चाहिए, किससे शादी करनी चाहिए, कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, किसे हिंदुस्तान में रहना चाहिए और किसे पाकिस्तान में, अब सरकार औपचारिक रूप से भी ये बता देना चाहती है कि देश के लोगों को क्या देखना चाहिए और क्या नहीं देखना चाहिए। NDTV चैनल और उसके पत्रकारों को सत्ताधारी पार्टी के नेताओं द्वारा सबसे ज्यादा टारगेट करके चरित्र हनन किया जाना और गालियाँ दिया जाना तो पहले से चल रहा था, अब सरकार भी उनके इसी कार्य को आगे बढ़ाती दिख रही है।

हाल ही में एक मीडिया अवार्ड कार्यक्रम में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को सशक्त करने का भाषण देने वाले प्रधानमंत्री क्या इसी तरीके से मीडिया के सशक्तिकरण की बात कह रहे थे? आप सभी मीडिया मंचों को एक ही रंग में रंग देना चाहते हैं, जिससे सरकार के गलत कार्यों की आलोचना ना हो सके।

ऐसे वक़्त में जब देश में विपक्ष नाममात्र का ही बचा है, तब सरकार का आलोचनात्मक पक्ष दिखाना और भी आवश्यक हो जाता है,जिससे नीतियों की त्रुटियाँ सुधारी जा सकें और सरकारी नीतियों का लाभ आम जनता तक पहुँच सके। वर्तमान में सरकार के रुख को देखकर ये बिलकुल भी नहीं लगता कि वो आलोचना सुनने को भी तैयार हैं। यही कारण रहा कि पहले से ही भाजपा ने ‘NDTVइंडिया’ पर आने वाले रवीश कुमार के कार्यक्रम प्राइम टाइम का बहिष्कार करते हुए उसमें अपने राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को भेजना भी बंद कर दिया।

इस बार सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने NDTV पर एक दिन का बैन ये कहकर लगाया है कि पठानकोट हमले के दौरान NDTV ने कुछ ऐसी खबर दिखाई थी, जिससे आतंकवादी और अधिक नुकसान पहुंचा सकते थे। इससे समबन्धित एक नोटिस चैनल को जनवरी में ही भेजा गया था। जिसके जवाब में चैनल ने कहा था कि उसने वही जानकारियां साझा की थीं जो कि पहले से ही सोशल-मीडिया, ऑनलाइन अख़बारों और चैनलों के माध्यम से पब्लिक डोमेन में थीं। इसके बाद भी सरकार ने चैनल पर 24 घंटे का बैन लगा दिया है, जो कि 9 नवंबर से 10 नवंबर तक रहेगा।

BEA और एडिटर्स गिल्ड ने सरकार द्वारा NDTV पर लगाये गए इस बैन की कड़ी भर्त्सना करते हुए, इसे तत्काल वापस लेने को कहा है। बीईए एवं एडिटर्स गिल्ड ने सरकार के इस कदम को मीडिया की आज़ादी पर प्रहार बताया है। NDTV ने अपने ताज़ा बयान में कहा है कि उसने बाकी चैनलों की तरह ही पठानकोट की खबर दिखाई थी, पर सरकार द्वारा केवल NDTV को ही टारगेट किया गया।

सत्ताधारी पार्टी की मोहर पर चलने वाले चैनलों और अखबारों को छोड़ दिया जाए तो मीडिया जगत में सरकार के इस कदम की कड़ी आलोचना की जा रही है। इंडिया टुडे ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई ने ट्विटर पर लिखा कि –

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने ट्विटर पर सभी मीडिया वालों से काले रंग के साथ विरोध करने की अपील की है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व-न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने भी एनडीटीवी पर की गई कार्यवाही को गैरकानूनी बताया है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इस बैन की निंदा की है।

TheNachiketa.com भी सरकार द्वारा मीडिया पर किये गए इस प्रहार की कड़ी भर्त्सना करता है और इसे तुरंत वापस लिए जाने की मांग करता है। ‘पत्रकारिता में प्रश्नकारिता’ को केंद्र में रखकर चलने वाले मीडिया को बैन करने से नहीं बल्कि सरकार की छवि उसके कार्यों से बनेगी।

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