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शाम और गाजर का हलवा – मैकश की कलम से

लो साहब आज भी शाम हो गयी।ऐसा नहीं है कि ये शाम हर रोज नहीं होती,होती तो हर रोज ही है पर शाम तो शाम है ना! हर दिन की शाम में अजीब सा नशा,अजीब सा धुंदलका,एक अजीब सी ख़ामोशी है जो मैं हर शाम खोजता हूँ अपनी बालकनी में खड़े होकर।
पर मिलता कहाँ है ये सब! शाम आती है हमें महसूस कराती है फिर ले जाती है हमारे सामने से जैसे कोई गाजर का हलवा सामने से ले जाए।
अरे हां गाजर का हलवा ये भी तो हर शाम के जैसे ही है बस दिन भर इंसान उबलता है खुद को मसलता है तब जाके शाम की भूख मिटाने का उपाय सोच पाता है।

उसी तरह गाजर को उबालो इतना उबालो की उसकी कठोरता ही खत्म हो जाए, फिर खूब मसलो इतना ज्यादा मसलो की उसका पलीद निकल जाए उस इंसान की तरह जो शाम को घर लौट आया हो।
फिर उसमें मिला दो दूध और पकाओ अंतहीन समय तक उस इंसान की तरह जिसे अब नौकरी के बाद घर भी देखना है अपना!घर की समस्या मिलाके वो वो भी थक ही जाता है।
और अब अंत में पकाने के बाद चीनी मिला दो और लो साहब हो गया तैयार गाजर का हलवा।
उसी तरह जैसे घर के काम निपटाता हुआ इंसान रात में सूखी रोटी खा के तृप्त हो जाता है अपने घरवालों के चेहरे के मुस्कान को देखकर संतुष्ट हो जाता है।
अब आप पूछोगे इतनी लंबी बकैती क्यों!वाजिब है आपका सवाल।
सुनो मियां ! जवाब ये है कि इंसान आता घर को है ,थका हुआ , पलीद हुआ सा और उसको मिलता है उसी की हालत में भुक्तभोगी गाजर का हलवा जिससे दोनों परम संतोष को पा जाते हैं पर मुख्य मुद्दा ये है कि वो शाम है जो इन दोनों को मिलाती है,महसूस कराती है और चली जाती है।
और मैं हर शाम बालकनी में खड़ा उस शाम को निहारता हूँ,महसूस करता हूँ और निकल पड़ता हूँ बाहर उस हसीन सी शाम को खोजने।
किसी शाम ही ये मैंने लिखा था कि-
उस शाम के बाद वो आज तक नहीं मिला।
जो पूछा था पता उनका आज तक नहीं मिला।
किस्से नगमे शेर रुबाई, मिसरे मख्ते औ कता,
उस ग़ज़ल का वास्ता आज तक नहीं मिला।

‘मैकश’
09718757285

 

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