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भुखमरी से ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कब ?

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A malnourished child with his mother.

“भुखमरी की ज़द में है या दार के साये में है
अहले हिन्दुस्तान अब तलवार के साये में है

छा गई है जेहन की परतों पर मायूसी की धूप
आदमी गिरती हुई दीवार के साये में है”
स्व० दादा रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ जी की ये पंक्तियाँ वर्तमान माहौल पर एकदम सटीक बैठती हैं। सरकार ने सरहद पार सर्जिकल स्ट्राइक कर देश और मानवता के दुश्मनों को तो सबक सिखा दिया है लेकिन भुखमरी पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ना जाने कब किया जायेगा। उरी हमले के कुछ ही दिनों बाद देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने केरल की एक रैली में पाकिस्तान और हिंदुस्तान की जनता से सरहद के बजाय गरीबी और भुखमरी के खिलाफ जंग छेड़ने का आव्हान किया था। अब समय आ गया है कि इसे धरातल पर भी उतारा जाये। देश की आज़ादी से तुरन्त पहले और बाद के बीस वर्षों तक भुखमरी से मौतों का भयानक चित्र देश ने देखा है। 70 के दशक में सरकार कुछ हद तक इस पर काबू पा सकी, पर स्थिति में अधिक सुधार नहीं हो पाया।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स – 2016 की 118 देशों की सूची में भारत का स्थान 97वां है। यह सूची 2011-16 के बीच की स्थिति को दर्शाती है। यहाँ तक कि भारत से आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर बांग्लादेश इस मामले में बेहतर है। बांग्लादेश इस सूची में 90वें स्थान पर है। जीएचआई -2016 के अनुसार भारत की कुल आबादी में से 15.2% लोग कुपोषित हैं, जबकि लगभग 39% पांच वर्ष से कम आयु के बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। 4.8% बच्चों की मृत्यु पांच वर्ष से कम की उम्र में ही हो जाती है।

ये आंकड़े उस देश के हैं जहाँ 20% अनाज हर वर्ष भंडारण व्यवस्था के अभाव में खराब हो जाता है। वो बात अलग है कि ख़राब हुआ अनाज शराब उत्पादकों को सस्ते में मिल जाता है और किसी के मुंह का दाना किसी के जाम में बदल जाता है। ऐसी विसंगतियों का साया भी है और स्मार्ट-सिटी का सपना भी है। देश का भविष्य कुपोषित रहेगा तो देश का विकास किस प्रकार से संभव हो पायेगा।

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ऐसा नहीं है कि सरकारों ने इन वर्षों में कुछ भी नहीं किया है। संप्रग-2 की सरकार में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम – 2013 को अधिसूचित किया गया। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत 50% शहरी और 75% ग्रामीण आबादी को चावल, गेहूं और मोटा अनाज उपलब्ध करवाये जाने की व्यवस्था है। वर्तमान सरकार द्वारा भी ‘अंत्योदय अन्न योजना’ भी लागू की गई है। इन सब जतनों में बावजूद भी भुखमरी की समस्या में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया है। आज भी देश में 19.46 करोड़ लोग भूखे सोने को मजबूर हैं।

संविधान के अनुच्छेद 47 में विशेष रूप से प्रावधान किये जाने के बावजूद भुखमरी आज भी एक बड़ा मुद्दा है। वो अलग बात है कि राजनीतिक भाषणों और पार्टियों के घोषणापत्रों में इसका स्थान नीचे ही होता है। आखिकार, भूख से जूझता आदमी वोट बैंक तो है नहीं और न ही देश के सम्पन्न लोगों को विपन्न जनता से कोई सरोकार ही है। पत्रकारों के लिए भी यह तब ही मुद्दा बनता है जब कोई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे उजागर करता है।

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बेहतर यही होगा कि सरकार देश में पैर पसार चुकी भुखमरी की समस्या को गंभीरता से लेना शुरू करे। जिस प्रकार से अन्य मुद्दों से लोगों को जोड़कर उनका समाधान निकालने का प्रयास किया जा रहा है, उसी प्रकार से भुखमरी जैसे मुद्दे से भी आम जनता को जोड़ा जाना चाहिए। राशन वितरण की व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाते हुए इसे सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए। बच्चों में कुपोषण की समस्या का निदान आंगनबाड़ी व्यवस्था का ठीक से न चलना और उसमे व्याप्त भ्रष्टाचार भी है। जो अनाज और दूध बच्चों की थाली में जाना चाहिए था वो अधिकारियों और राजनेताओं की जेब में जायेगा तो देश का भविष्य स्वास्थ्य कैसे रह सकता है। जब तक शहर में 47 और गाँव में 32 रुपये खर्च करने वाले को सरकार समृद्ध मनेगी, तब तक कुपोषण और भुखमरी से मुक्ति नहीं मिल पायेगी। 30-32 रुपये में एक दूँ का भोजन आखिर कहाँ मिलता है?
मौजूदा कानूनों में व्याप्त खामियों को दूर किये बिना न तो सरकारी योजनाएं सफल होंगी और न ही भारत भुखमरी से मुक्ति पायेगा। राजनेताओं के नारों और भाषणों से देश के साढ़े 19 करोड़ लोग कब तक पेट भरेंगे?

“सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिये,
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरख्वान को?”

– अदम गोंडवी

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