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देश में हर दूसरे दिन हो रहा है एक एनकाउंटर, पूरी खबर जानकार चौंक जायेंगे आप !

हर दूसरे दिन हो रहा है एक एनकाउंटर

भोपाल जेल से भागे प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्यों के एनकाउंटर पर रोज़ नए प्रमाणों के साथ प्रश्न उठ रहे हैं। इस घटना ने राजनीतिक हलकों में सक्रियता तो बढ़ाई ही है, इसके साथ ही एनकाउंटर के पुराने पृष्ठों को भी सबके सामने खोलकर रख दिया है।

संसद में पेश किये गए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा संकलित आंकड़ों की माने तो 2004 से 2014 के दशक के बीच कुल 1,654 एनकाउंटर हुए। लगभग हर दूसरे दिन एक एनकाउंटर किया गया है। इन आंकड़ों में सेना और अर्धसैनिक बलों के ऑपरेशन में मारे गए लोगों को नहीं जोड़ा गया है। जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों में घटने वाली घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं लेकिन उनका कोई निश्चित आंकड़ा दर्ज नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी वर्ष जुलाई में एक याचिका की सुनवाई के दौरान मणिपुर में पिछले दो दशकों में हुए 1,562 मामलों की दुबारा जांच के आदेश दिए हैं।

जेल में जगह न होने के साथ-साथ ज्यादा कैदियों के होने की वजह से ऐसी घटनाएं ज्यादा बढ़ रही हैं। जेल में सुरक्षा व्यवस्था की भारी कमी भी ऐसे एनकाउंटर को बढ़ावा देती है। भोपाल जेल से भागे कैदियों के एनकाउंटर के बाद भी यही प्रश्न उठे हैं, जब भागे हुए कैदियों की सेल के बाहर मौजूद 4 CCTV कैमरों में से एक भी काम नहीं कर रहा था। इसके अलावा जेल की सुरक्षा व्यवस्था में नियुक्त किये गए प्रहरियों में से आधे से ज्यादा वीआईपी और वीवीआईपी की सुरक्षा में लगे थे। इनमें से कई प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सुरक्षा में भी लगे थे। जब पूरा तंत्र ही इस लापरवाही लिप्त पाया गया है, तो आखिर कार्यवाही किसके खिलाफ होगी?

एनकाउंटर के अतिरिक्त पुलिस कस्टडी में वर्ष 2013-14 के मध्य 470 लोगों की मौत के मामले दर्ज हुए। इसके अलावा 1,358 लोगों ने पुलिस कस्टडी में पुलिस द्वारा टार्चर किये जाने के मामले दर्ज करवाये हैं। संभवतः ये आंकड़ा काफी कम है क्योंकि बहुत से मामले पुलिस ने दर्ज ही नहीं किये होंगे या पीड़ितों ने ही पुलिस के डर से दर्ज नहीं करवाये होंगे।

ऐसे मामलों के प्रकाश में ना आने का एक कारण पुलिस पर राजनेताओं का प्रभाव अथवा संग्रक्षण प्राप्त होना भी है। कई एनकाउंटरों के पीछे राजनीतिक विद्वेष भी छिपा होता है। जिसे बाद में राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा न्यायसंगत सिद्ध कर दिया जाता है। आम लोगों में एनकाउंटरों को लेकर कोई सोच इसलिए भी नहीं दिखती है क्योंकि भारतीय सिनेमा ने एनकाउंटर को काफी हद तक महिमामंडित कर रखा है, जिसके पीछे कानून और लोकतंत्र की कमजोर पड़ती जड़ों से किसी का सरोकार नहीं रह गया है। एनकाउंटर को फैशन की तरह स्वीकार कर लिया गया है। NCRB के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 में 55,000 केस पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज हुए हैं।

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