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लोकआस्था का महापर्व :छठ

लोकआस्था का महापर्व छठ शुक्रवार को ‘नहाय खाय’के साथ शुरू हो गया।नहाय खाय के दिन छठ व्रती चावल दाल और कद्दू की सब्जी बनाते हैं और यही प्रसाद के रूप में लोगों को वितरित करते हैं ।शनिवार को  छठ व्रती ‘खरना’करेंगे।इस दिन शाम को प्रसाद के रूप में खीर ,रसिया या चावल-दाल का भोग लगता है।इस दिन बड़ी संख्या में लोग एक दूसरे के यहां जाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।रविवार को संध्या अर्ध्य होगा,इस दिन छठ व्रती शाम को डूबता सूर्य को अर्ध्य देते हैं।इस दिन लोग शाम को नदी ,तालाब किनारे जाकर सूर्य की उपसना करते हैं।और सोमवार की सुबह उगते सूर्य को अर्ध्य देने के साथ ही ये 4 दिनों तक चलने वाला यह पर्व समाप्त हो जायेगा।छठ पर्व की महत्ता जितनी एक बिहारी को पता है उतनी किसी को नहीं।वैसे तो देश के अन्य राज्यों में भी छठ मनाया जाता है,लेकिन छठ और बिहार एक दूसरे के पूरक हैं।बिहार को अंतराष्ट्रीय स्तर पर छठ पहचान दिलाता है तो छठ भी बिहार के नाम के साथ ही जाना जाता है।छठ अपने आप में एक अनोखा पर्व है,जिन लोगों ने अपने मन में ये धारणा बना ली है कि यूपी -बिहार के लोग साफ सफाई नहीं रखते,उन्हें एक बार छठ पुजा में  जरुर शामिल होना चाहिये।क्योंकि छठ पुजा में साफ सफाई,स्वच्छता और शुद्धता का खास महत्व है।इसमें एक एक काम को करने में खास ध्यान रखा जाता है की कोई गलती न हो। काम,पढ़ाई के सिलसिले में जो लोग भी बाहर रहते हैं,वो छठ पर्व में जरूर अपने घर आते हैं,भले ही इसके लिए उन्हें कितनी भी कठिनाइयां झेलनी पड़ें।छठ के मौके पर बिहार की ओर आने वाली किसी भी ट्रेन में जगह मिलना बहुत ही मुश्किल है।क्योंकि ऐसा लगता है जैसे पूरा बिहार ही अपने गांव जाने को निकल परता है।इसी पीड़ा का जिक्र डॉ कुमार विश्वास ने अपनी एक कविता की एक पंक्ति में किया है जिसने बोल हैं -जैसे छठ के मौके पर जगह मिल जाये गाड़ी में!इसी पंक्ति से आप समझ सकते हैं कि छठ के मौके पर ट्रेन में जगह मिलना कितना मुश्किल है।अब तो देश के लगभग सभी हिस्सों में छठ का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है।जो लोग भी छठ में अपने घर नहीं आ पाते वो जहां रहते हैं वहीं छठ पूजा करने लगे हैं।बड़ी संख्या में पूर्वांचल के लोग दिल्ली-मुम्बई जैसे बड़े शहरों में रहते हैं,इसलिये अब वहीं छठ पूजा करने लगे हैं।छठ पर्व एक तरह से परिवारों का मिलन होता है।

क्योंकि इस पर्व में घर के सभी सदस्य छठ मनाने घर आते हैं ,चाहे वो साल भर कहीं भी रहें।ये पर्व हमें प्रकृति के करीब ले जाता है,इस पर्व में सूर्य देव की आराधना होती है,जो हमें यह संदेश देता है कि हमें हमेशा प्रकृति की रक्षा करनी चाहिये, ये पर्व हमें अपने आसपास सफाई रखने के लिये प्रेरित करता है।छठ के पर्व पर गीत संगीत का भी लाखों करोड़ों का बाजार है।अगर लता मंगेशकर स्वर कोकिला हैं तो शारदा सिन्हा बिहार कोकिला हैं।शारदा सिन्हा के गीतों का जादू ही ऐसा है कि उनकी आवाज सुनते ही आप छठ के त्यौहार में पुरी तरह खो जाते हैं।इस बार छठ पर भी शारदा सिन्हा का एक गीत सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है ,इसमें एक नए युग के बिहारी युवा की कहानी दिखायी गयी है कि कैसे उसकी मॉडर्न पत्नी भी छठ के रंग में रंग जाती है और छठ करती हैं।छठ पर्व की महिमा ही कुछ ऐसी है कि ये सभी को अपने अंदर समेट लेता है।आप सभी को छठ पर्व की हार्दिक बधाइयाँ।

 

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