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इस वर्ष इतिहास में कार्बन उत्सर्जन चरम पर, मनाइये “ये दिवाली, पर्यावरण वाली”

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“ये दिवाली, पर्यावरण वाली”

हम में से संभवतः ऐसे कोई नहीं होगा, जिसने कभी न कभी किसी अवसर पर ‘ग्लोबल-वार्मिंग’ पर निबंध न लिखा हो। कम से कम पिछले 20-25 सालों में ये गंभीर चर्चा का विषय तो बना ही है। ‘गूगल-बाबा’ से ही पूछकर देखिये, अनगिनत निबंध मिल जाते हैं। अकादमिक वाद-विवाद प्रतियोगिता, निबंध प्रतियोगिता आदि के लिए ‘गूगल-बाबा’ के पास खूब सारी सामग्री है। वहां से उठाकर प्रतियोगिताओं का मसाला तो तैयार हो जाता है, परंतु ‘ग्लोबल-वार्मिंग’ को लेकर अबतक जो होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। जब-तक बड़े शहरों में सांस लेना दूभर नहीं हो गया तब-तक लोगों के लिए यह कोई विषय नहीं था। जब-तक अखबार-टीवी वाले हमें डरावने परिणाम नहीं दिखाते, तब-तक हमें होश नहीं आता। नौकरी, राजनीति, खेल, मनोरंजन आदि से हमें फुर्सत ही कहाँ है, जो हम पर्यावरण के बारे में सोचें।

बचपन में हिंदी की किताब में हमने एक पाठ पढ़ा था। मशहूर पक्षी विज्ञानी एयर पर्यावरणविद् सालिम अली पर आधारित उस निबंध में एक जगह केरल में कट रहे पेड़ों का ज़िक्र सालिम अली जी ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी से किया था। सालिम अली जी ने प्रधानमंत्री जी को उदाहरणों के माध्यम से समझाया था कि कैसे वृक्षों के कटने से स्व० चौधरी चरण सिंह जी को समझाया, जिसे सुनकर प्रधानमंत्री जी की आँखों में आंसू आ गए थे। इसके बाद उन्होंने वहां कटाई रुकवाने का आश्वासन दिया था।

ये तो रही संवेदनशीलता की बात, आइये ग्लोबल-वार्मिंग की वर्तमान स्थिति के बारे में जानते हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था है – ‘वर्ल्ड मीटियो रोलॉजिकल आर्गेनाईजेशन (WMO), जो विश्व की जलवायु एवं मौसम संबंधी परिवर्तनों की जानकारी प्रस्तुत करती है। WMO की 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में कार्बन उत्सर्जन पिछले एक वर्ष में जितना हुआ है, उतना इतिहास में आज-तक नहीं हुआ। विश्व भर में पिछले एक वर्ष में 400 ppm कार्बन का उत्सर्जन हुआ है। औद्योगिक जगत, पेट्रोल-डीजल आधारित वाहनों एवं बिजली उत्पादन केंद्रों का इसमें विशेष योगदान रहा है। इसका असर हमें प्राकृतिक आपदाओं के रूप में तो दिख ही रहा है। इसके अतिरिक्त इस वर्ष आर्कटिक समुद्र की बर्फ और ग्रीनलैंड की बर्फ अपने वांछित समय से पहले ही गलना शुरू हो गई थी। WMO के महासचिव पी. तल्लास ने इन बदलावों को ध्यान में रखते हुए जलवायु परिवर्तन पर हुई पेरिस संधि को लागू करने की आवश्यकता बताई है और देशों को कम कार्बन उत्सर्जन करने वाली अर्थव्यवस्था को अपनाने का आग्रह किया है।

ऐसा नहीं है कि इस सबको लेकर सरकार कुछ कर नहीं रही है। हाल ही में पेरिस में जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत सहित विश्व के कई देशों ने एक संधि पर हस्ताक्षर किये हैं। इस संधि में उठाये गए बिंदु यदि सभी देश लागू कर देते हैं तो कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आ सकती है। इसमें समस्या बस इतनी ही है कि विकसित देश इसे गंभीरता से लेते नहीं दिखते हैं। विकासशील देश, जिनमें भारत भी शामिल है, लगातार कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने का प्रयास करते रहे हैं, जिसके परिणाम भी सकारात्मक हैं। इसके बाद भी खतरा अभी टला नहीं है।

भारत की बात करें तो कार्बन उत्सर्जन से हमारी अर्थव्यवस्था को भी 13% का नुकसान हर वर्ष हो रहा है। कम कार्बन उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्था का मॉडल ही समय की मांग है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि दिल्ली में हर बच्चा 14 सिग्रेट के बराबर का धुंआ रोज़ सांस लेते हुए अंदर ले रहा है। यही कारण था कि दिल्ली सरकार ने ऑड-इवन स्कीम लागू की और दिल्ली स्थित एक थर्मल पॉवरप्लांट को बन्द भी किया गया।

भारतीय कंपनी विप्रो के मालिक अज़ीम प्रेमजी अपनी दानदाता वाली छवि के लिए तो प्रसिद्ध ही हैं। इसके साथ ही विप्रो भारत में कार्बन उत्सर्जन में सबसे ज्यादा 24% गिरावट लाने वाली कंपनी भी है। इसके लिए कम्पनी ने प्राकृतिक ऊर्जा उत्पादन को अपनाया। इससे कम्पनी को आर्थिक रूप से भी फायदा ही हुआ है। बाकी लोगों को भी इन उदाहरणों से सीखना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी प्राकृतिक ऊर्जा के स्त्रोतों को अपनाने पर जोर दिया है।

15 अक्टूबर, 2016 को रवांडा में विश्व के 197 देशों ने HFCs के उत्पादन में कमी लाने वाली संधि पर हस्ताक्षर किये हैं, जो कि 1 जनवरी, 2019 से लागू होगी। इसके लागू होने से 70 बिलियन टन CO2 उत्सर्जन में कमी आएगी। हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFC) CO2 से 12,000 गुना ज्यादा ग्लोबल-वार्मिंग बढ़ाती है। यह गैसों हमारे एसी और फ्रिजों से निकलतीं हैं।

यदि हमें सुरक्षित रहना है, तो हमें अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। अपने स्तर पर भी हमें आगे आकर उपाय करने होंगे। अपनी जीवनशैली में आधारभूत परिवर्तन लाने होंगे। पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाने वाली वस्तुओं का सीमित इस्तेमाल करना चाहिए। दिवाली आने वाली है। दिवाली में पटाखे तो सबके चहेते होते हैं पर इनसे होने वाले प्रदूषण का परिणाम वीभत्स होता है। छोटे जीवों के साथ ही श्रवण-श्वास की बीमारी से ग्रसित लोगों के लिए यह जानलेवा होता है। अब यह हमें स्वयं ही सोचना चाहिए कि क्या हम श्री राम जी का स्वागत उनकी बनाई दुनिया के जीवों को नुक्सान पहुंचाकर करें या सबके साथ खुशियाँ बांटकर करें। कुछ कुटिल राजनेता इस अवसर का भी लाभ अपनी राजनीति चमकाने के लिए करने लगते हैं। कहते हैं कि केवल हिंदुओं के त्योहारों में ही दुनिया को प्रदूषण होता दिखता है। ऐसी मानसिकता रखने वालों को प्रदूषण समझकर इनके विरुद्ध खड़े होने की जरुरत है। यदि पर्यावरण नहीं बचा तो सबसे पहले हम नहीं बचेंगे। ऐसे सभी त्योहारों और आयोजनों से हमें दूरी बनानी होगी जिसमें बेवजह प्रदूषण फ़ैलाया जाता है। ग्लोबल वार्मिंग न तो एक दिन में होती है और न ही एक दिन में ख़त्म हो जायेगी। जरुरत है कि हम सभी निरंतर इसको कम करने के लिए प्रयासरत रहें।

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