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बच्चे भूखे बैठे हैं… ( ‘मैकश’ की कलम से )

सभी को प्रणाम एक अदने से शायर का।

यूं तो साहब कई महफ़िलों से गुजरते भी हैं और कई महफ़िल छोड़ भी आते हैं पर आज बात महफ़िल की नहीं होगी।
बात कुछ यूं है मियां, चंद एक साल पहले ही हम भोपाली चचा से देल्ही के delhites बन के इस शहर में आये। हालांकि आ तो बचपन से ही रहे थे पर इस बार उसूल अलग था, इस बार बात पापी पेट की थी। जैसे सभी भाग रहे थे हम भी आ गए साहब भागने।
पर जब इस शहर में आये तो कुछ ऐसा मिला हमें जिसने इंसानियत के बारे में सोचने को मजबूर किया। क्या करें साहब आदत नहीं थी ना ऐसे मरे हुए जमीर के इंसान बनके रहने की।
अब आप कहेंगे ऐसा क्या हो गया यहाँ जो ऐसा सोचना पड़ गया! बताता हूँ साहब आराम से! रुको! सांस तो ले लेने दो।
किसी भी चौराहे पर खड़े हो जाओ साहब और देखो कुछ चीजें तो मिलनी ही हैं चाहे वो दिन भर की कमाई शराब में उड़ाते मजदूर, या पीने वाले पानी से सड़क धुलती आंटी, या दो चार अपनी माओं के लाडले या बूँद-बूँद पानी को तरसते आम लोग या बड़े घरों की बदनुमा सी दिखावटी रईसी।
बस इन्ही सब को देखा ना साहब! दिल भर आया और लिख दिया हमने भी कुछ उन लोगों पर जिन्हें श्वान शिशु का मतलब भी समझ नहीं आता क्योकि वो कहते हैं कि ‘मेरी हिंदी अच्छी नहीं’! और इसीलिए लिखा भी हिंदीं में।
पढ़ लेना साहब हो सकता है आपके भी बगल वाले चौराहे पर यही सब दिख जाए तो मेरा लिखना सफल हो जाए।

” तुम भक्ति भाव में रहते हो,कुछ बच्चे भूखे बैठे हैं।
हरियल हाहाकार मचाये हो,कुछ पत्ते सूखे बैठे हैं।
बह जाता है नाली में दूध,बड़े घरों के बच्चों से,
उसी शहर में कही गली पर,दो बच्चे भूखे बैठे हैं।
धुल जाती है कितनो की सड़कें पीने वाले पानी से,
उसी सड़क पे रिकशेवाले,प्यासे भूखे बैठे हैं।
वो चार वहाँ जो खड़े हैं,शहजादे अपनी माँओं के,
बच्ची एक जो बगल से गुजरी, तो हैवान भूखे बैठे हैं।
वो धुंआ उड़ाये जा रहा,उसने खोंसी है कमर में,
पीकर भी ना सोचे है,घर में बच्चे भूखे बैठे हैं।
कल श्वान शिशु ने कातर आँखों से झाँका मुझको,
फिर पता चला बेजुबाँ,ये प्यार के भूखे बैठे हैं।
लंगर में बिकता इंसान यहाँ मुफ्त में खाने की आदत,
मैकश फिर ये जान गया,क्यों भगवन भूखे बैठे हैं।”

श्रेयस अपूर्व नारायण’मैकश’
स्वतंत्र शायर व ग़ज़लकार
दिल्ली
09718757285

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