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सरकार के नाम एक किसान के बेटे का खुला खत !

 

आमतौर पर ये माना जाता है की सरकार के निर्णय जनता की भलाई हेतु होते हैं और इनसे जनता का सीधेतौर पर ना सही पर एक समाज के तौर पर फायदा होता है जबकि हाल ही में भारत के इतिहास में पहली बार सरकार द्वारा लिए गए निर्णय से लगभग 50 से ज्यादा मौते हो चुकी हैं तर्क दिया जा रहा है की नोटबंदी के इस निर्णय से देश में कालाधन समाप्त हो जायेगा और अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी हालाँकि ये भी समझना जरूरी है की देश में सिर्फ और सिर्फ छह प्रतिशत कालाधन ही कैश के रूप में है बाकी का सारा दो नंबर का पैसा या फिर इन्वेस्ट कर दिया जाता है या फिर सोने में खपा दिया जाता है ऐसे में सिर्फ और सिर्फ 6 प्रतिशत बेईमानो को पकड़ने के लिए 94% जनता को प्रताड़ित करना कहाँ तक सही है ये तो नहीं पता लेकिन ये जरूर पता है की जिन लोगों के मौत हुई है उनकी मौत के जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ आप है सरकारजी |

सरकार जी, आप कहते हैं की जनता को थोड़ी असुविधा हुई है चलिए मान लेते है की थोड़ी असुविधा हुई है वैसे भी हम हिंदुस्तानियों के बचपन से एडजस्ट करना ही सिखाया जाता है और अगर कोई अच्छा विकल्प ना हो तो हम किसी भी कामचलाऊ चीज को चुन लेते है, पाठकों से निवेदन है की इस बात को सरकार से कतई ना जोड़े | सरकार जी देश में हर दिन लगभग दो लाख शादिया होती हैं, एक बाप अपनी बेटी की शादी के लिए बैंको की लाइन में लगता है और दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो जाती है | आठ दिन बाद आपने घोषणा की कि जिनके घरों में शादियां है वो ढाई लाख रूपये है निकाल सकते हैं हालाँकि यहाँ दो हज़ार निकालना तो दूभर हो रहा है ढाई लाख कि बात करना भी एक जुमले से ज्यादा कुछ नहीं |

किसी ने कहा है “१ निर्दोष के मरने से अच्छा है 10 दोषी बच जाए” लेकिन यहाँ तो पचास से ऊपर निर्दोष जनता मर चुकी है और पूरी सरकार नोटबंदी के सही ठहराने में लगी है , कुछ राजनेता कह रहे हैं नोटबंदी गर्व कि बात है आखिर उन्हें क्यों ये समझ नहीं आ रहा की कतार में लगकर मरने में कौन सा गर्व है ? कल घर में माँ से बात हुई तो पता चला की बोआई और रोपाई का समय चल रहा है, खाद की कीमत १००० तक होती है और दिन भर लाइन में लगने के बाद भी जब सिर्फ दो हज़ार मिलता है तो पक्की है की कम से कम किसान के मन से सरकार जी के दुआएं तो नहीं ही निकलती होंगी, मुझ जैसे लोग तो गाँव से हज़ारों मील दूर रोटी कमाने आते हैं क्या उन्हें अपने घर की चिंता नहीं होती होगी ? और भला हम कर भी क्या सकते हैं सिवाय ऊँगली में स्याही पुतवाने के, क्योंकी हमें आदत ही कुछ ऐसी है |

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