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खौफ नही रहा किसी का, ईमान नहीं है अब !


जो एक फूल भी गुम हो तो वादी रूठ जाती थी,

वहाँ  बच्चे  मार  देना  भी  मना  नहीं  है  अब!

देश की हालत और उसमें गुमसुम बेबस युवाओं की घुटन और अकेलेपन को लफ़्ज़ों में बांधकर ग़ज़ल का रूप देने में माहिर युवा कवि व शायर गौतम वशिष्ठ जी ने अपनी इस ग़ज़ल में वर्तमान में समाज की स्थिति पर चोट की है। वर्तमान में भोपाल एनकाउंटर, जेएनयू से लापता छात्र नजीब समेत कश्मीर में घटित घटनाओं पर कड़ा प्रहार करते हुए यह ग़ज़ल लिखी है। आप भी पढ़ें और महसूस करें!

खौफ नही रहा किसी का ईमाँ नहीं है अब ,
ऐसी घनी आबादी और इंसाँ नही है अब।

हुस्न भी किसी का दिलखेज नही एे दोस्त,
और इश्क भी किसी का जवाँ नही है अब।

उस महान भारत के वो कर्ण क्या हुए ?
किसी एक शख्स में भी वो अना नहीं है अब।

था जंग का उसूल कि निहत्थों को बख़्श दें,
यहाँ छुप के वार करना तक गुनाह नही है अब।

जो एक फूल भी गुम हो तो वादी रूठ जाती थी,
वहाँ बच्चे मार देना भी मना नही है अब ।

ये दौर है ऐसा कि बस भीतर की जंग है ,
किसी गैर मुल्क का युद्ध ठना नही है अब।

यहाँ कातिलों के हाथ खुद मुंसिफ ने धो डाले,
सफेद ओ खाकी़ पर कुछ सना नही है अब।

मैं रोज ढूँढता हूँ अपने दिल में ही उनको
जो यहीं के थे लेकिन यहाँ नहीं हैं अब !

गौतम वशिष्ठ मूलतः बिहार के लखीसराय जिले के निवासी हैं,फ़िलहाल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ,दिल्ली से रसियन भाषा में स्नातकोत्तर (एम. ए) कर रहे हैं।

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